Wednesday, February 19, 2014

ठण्ड का कहर ...

   ठण्ड का कहर ...
 
आज पूरी दुनिया में बर्फ़बारी ने जिस तरह से हिमयुग कि दस्तक कैसी हो सकती है  …?? का एहसास करवाया है वह शरीर में सिरहन पैदा कर गया है , यदि वास्तव में ऐसा हो गया  .... ?? तो क्या होगा  …?? अब सोचने का वक्त आ गया है कि प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ हमने किया है उसका खामियाजा तो हमें ही भुगतना होगा।
 
पूरे भारत को ठण्ड ने ठिठुरा दिया है और लगता है शब्द मानों मुँह से बाहर का रास्ता जैसे-तैसे पकड़ते हैं और जम कर जाम हो जाते हैं. अब कडकडाती ठण्ड हो और धुन्ध ना छाई हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता. 
 
‘धुन्ध’ भी कैसी समदर्शी है किसी को भी अपने में समेट लेती है बिना किसी भेदभाव के,चाहे हम इंसान कितना भी भेदभाव कर लें.
 
धुन्ध कि इक खासियत ये भी है कि इसमें आप आसानी से छुप सकते हैं और चाहें तो कुछ फूट कि दूरी तक अपने अस्तित्व को लोगों से छुपा भी सकते हैं.
 
पहाड़ों पर तो धुन्ध का नजारा देखने लायक होता है, ऐसा लगता है मानो आसमान और धरती का मिलन कहाँ शुरू हो रहा है और कहाँ खत्म, पता ही नहीं चलता.
 
ऐसे समय में एक गाना बड़ी शिद्दत से याद आता है: “ संसार की हर शै का इतना ही ठिकाना है इस धुन्ध से आना है इक धुन्ध में जाना है...”

5 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-02-2014 को चर्चा मंच पर प्रस्तुत किया गया है
    आभार

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सांसद बनना हो तो पहले पहलवानी करो - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. ख़ूबसूरत तस्वीरों और मौसम की विभीषिका के माध्यम से छोटे-छोटे वक्तव्यों के माध्यम से बहुत सार्थक बातें कही हैं!! बहुत सुन्दर!!

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  4. ख़ूबसूरत ख़ूबसूरत ख़ूबसूरत

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